गुरुवार, 2 अगस्त 2012

माँ को राखी


जरूरत है कि आज (भारत) माँ को राखी बांधी जाये ।
वचन देने के लिये कि यह राखी उसकी रक्षा के लिये है, जो
दर असल हमारी ही रक्षा है ।

मां जिसके गोद में कांधों पर खेल कर हम बडे हुए ।
मां जिसने हमें पाल पोस कर बडा किया, पढने लिखने की सुविधा दी ।
पांवों पर खडे होने का सहारा दिया ।
वही मां आज कैसे दुर्दिन देखने को मजबूर है ।
कैसी लूट खसोट हो रही है उसके साधनों की ।
कैसे उसके बहुतसे बच्चे वंचित हैं सुविधाओं से ।
वह दुखी है, विवश है ।
वह हमारी और तक रही है ।

हम जो सबल हैं हम जो कुछ कर सकते हैं ।
पर हम तो अपने लिये ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं बटोर रहे हैं ।
हमें फुरसत कहां कि माँ को देखें, उसके वंचित संतानों को देखें ।
यह बाजार वाद यह पूंजी वाद हमें भावनाहीन, चेतना-शून्य करता जा रहा है ।
जरा ठहरें, सोचें कि हमें ये कहां ले जायेगा ?
हमारे संतानों को हम कैसे इन्सान बनायेंगे ?
इन्सान या हैवान या फिर संवेदनाशून्य रोबोटस् ।
बाज़ार का खाना, बाज़ार का पानी और आया के संस्कार और क्या बनायेगा इनको ।
दादा दादी नाना नानी तो हमें गंवारा नही घर में ।

जरूरत है कि मां को फिर से संवारा जाये, उसका बल बना जाये ।
रिश्तों को संजोया जाये ।
यह वचन दिया जाये मां को कि उसकी रक्षा ही हमारा आद्य कर्तव्य है,
और यह हम प्राण पण से निभायेंगे ।
यह राखी इसी वचन का प्रतीक है ।
एक टिप्पणी भेजें