सोमवार, 23 अगस्त 2010

तुम क्यूं चले आते हो…..


तुम क्यूं चले आते हो…..
तुम क्यूं चले आते हो दबे पांव
मेरे खयालों में ?
अचानक ही अनमनी सी हो जाती हूँ मैं ।
किसी चीज का रहता नही होश,
जागती आँखों से सपने में खो जाती हूँ मै ।
किसी के पूछने पर कि क्या हुआ
एक झूटी सी हँसी हंसती हूँ मै ।
किताब में दबे मुरझाये सूखे फूलों को
हौले से सहलाती हूँ मै ।
किसी पुरानी चिठ्ठी को
आँसुओं से भिगोती हूँ मै ।
यादों के दर्पण पर जमी धूल पर 
हलके से आँचल फेरती हूँ मै ।
मेरे वर्तमान को भूल ही जाती हूँ,
खाती हूँ झिडकियाँ ।
आँचल को खींचते माँ माँ कहते छोटे बच्चे को
यकायक सीने में भींच लेती हूँ मै ।
तुम क्यूं दबे पाँव चले आते हो मेरे खयालो में ?
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