सोमवार, 23 अगस्त 2010

तुम क्यूं चले आते हो…..


तुम क्यूं चले आते हो…..
तुम क्यूं चले आते हो दबे पांव
मेरे खयालों में ?
अचानक ही अनमनी सी हो जाती हूँ मैं ।
किसी चीज का रहता नही होश,
जागती आँखों से सपने में खो जाती हूँ मै ।
किसी के पूछने पर कि क्या हुआ
एक झूटी सी हँसी हंसती हूँ मै ।
किताब में दबे मुरझाये सूखे फूलों को
हौले से सहलाती हूँ मै ।
किसी पुरानी चिठ्ठी को
आँसुओं से भिगोती हूँ मै ।
यादों के दर्पण पर जमी धूल पर 
हलके से आँचल फेरती हूँ मै ।
मेरे वर्तमान को भूल ही जाती हूँ,
खाती हूँ झिडकियाँ ।
आँचल को खींचते माँ माँ कहते छोटे बच्चे को
यकायक सीने में भींच लेती हूँ मै ।
तुम क्यूं दबे पाँव चले आते हो मेरे खयालो में ?

46 टिप्‍पणियां:

Manish Pandey ने कहा…

Saral lekin wastavik bhavon se bhari rachna hai. Pathak swayam bhi unhi yadon me kho jata hai.

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) ने कहा…

बढिया प्रस्‍तुति .. रक्षाबंधन की बधाई और शुभकामनाएं !

kshama ने कहा…

आँचल को खींचते माँ माँ कहते छोटे बच्चे को
यकायक सीने में भींच लेती हूँ मै ।
तुम क्यूं दबे पाँव चले आते हो मेरे खयालो में ? Na jane kitne hee anmane dilon ke ehsaas bayan kar diye aapne...seedhee,saral bhashame!

समयचक्र ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति........ रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाये और बधाई....

sanu shukla ने कहा…

umda rachna..

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत बढिया प्रस्‍तुति .. आपको रक्षाबंधन की बधाई और शुभकामनाएं !!

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…


गहरी अभिव्यक्ति यादों की ओर खींचते हुए
बहुत सुंदर रचना है।
आपको श्रावणी पर्व की हार्दिक बधाई

लांस नायक वेदराम!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

यादों के दर्पण पर जमी धूल पर
हलके से आँचल फेरती हूँ मै ।
मेरे वर्तमान को भूल ही जाती हूँ,
खाती हूँ झिडकियाँ ।
आँचल को खींचते माँ माँ कहते छोटे बच्चे को
यकायक सीने में भींच लेती हूँ मै...

बहुत अच्छी रचना...
रक्षाबंधन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं.

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना...
रक्षाबंधन पर पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाये.....

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा रचना...


रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बड़ी ही सुन्दर रचना।

आपका अख्तर खान अकेला ने कहा…

kisi ki aad ko is andaaz men yaadgaar prstutikrn ki yeh pehli rchnaa he iske liyen bdhaayi. akhtar khan akela kota rajsthan

Arvind Mishra ने कहा…

क्षणों की याद सदियों तक -क्या भीनी भीनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है ! वाह !!

मनोज कुमार ने कहा…

संवेदना की प्रस्तुति ही इसकी प्रमुख विशेषता है।

संजय @ मो सम कौन... ने कहा…

बेहतरीन ख्यालात।

बेहद भावपूर्ण।

आभार स्वीकारें।

अजय कुमार ने कहा…

भावपूर्ण प्रस्तुति ।

भाई-बहन के मजबूत रिश्तों का पर्व रक्षाबंधन सब भाई-बहनों के रिश्तों मे मजबूती लाये

hem pandey ने कहा…

यादों के दर्पण पर जमी धूल पर
हलके से आँचल फेरती हूँ मै ।

-सुन्दर

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

आँचल को खींचते माँ माँ कहते छोटे बच्चे को
यकायक सीने में भींच लेती हूँ मै ।

बहुत अच्छी लगी आपकी रचना...

vijay kumar sappatti ने कहा…

WAAH WAAH WAAH ....TAYI .. KYA KHOOB LIKHA HAI , KYA KAHUN .. MAN KO CHOO GAYA ... BADHAYI

VIJAY
आपसे निवेदन है की आप मेरी नयी कविता " मोरे सजनवा" जरुर पढ़े और अपनी अमूल्य राय देवे...
http://poemsofvijay.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html

शोभना चौरे ने कहा…

sundar rachna

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

क्या बात है आशा जी. बहुत सुन्दर.

Anand Rathore ने कहा…

bahut badhiya ..

Archana Chaoji ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Archana Chaoji ने कहा…

निशब्द हूँ..............

Archana Chaoji ने कहा…

निशब्द हूँ-----

SATYA ने कहा…

अच्छी कविता,
शुभकामनाएं !

Urmi ने कहा…

रक्षाबंधन की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!
बहुत सुन्दर और लाजवाब रचना लिखा है आपने जो प्रशंग्सनीय है! उम्दा प्रस्तुती!

Aruna Kapoor ने कहा…

....दिल को छू लेने वाले भाव है इस कविता में!...सुंदर अनुभूति!

सुरेन्द्र Verma ने कहा…

तुम क्यूं चले आते हो दबे पांव
मेरे खयालों में ?
Its Universal TRUTH.

daanish ने कहा…

rachnaa...
bahut achhee hai
kavyamaee hai,,,
chitt ko aakarshit karti hai . .
abhivaadan svikaarein

vikram7 ने कहा…

आँचल को खींचते माँ माँ कहते छोटे बच्चे को
यकायक सीने में भींच लेती हूँ मै ।
तुम क्यूं दबे पाँव चले आते हो...
बहुत ही सुन्दर रचना ,बधाई

Unknown ने कहा…

ek bahut hi umda prastuti.
asan shabdon mein, man ki vyagrata ko dikhane ka adbhut prayatna sarahniya hai.

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

आप की रचना 27 अगस्त, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
http://charchamanch.blogspot.com

आभार

अनामिका

Rahul Singh ने कहा…

'तुम क्यूं दबे पाँव चले आते हो मेरे खयालो में?' पढ़कर सुनाई पड़ता है, 'यूं ही आते-जाते रहा करो'

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

तुम क्यूं चले आते हो…..
तुम क्यूं चले आते हो दबे पांव
मेरे खयालों में ?

ओये होए .....!
आशा जी क्या बात है .....

दुआ है ये हसीं ख्याल यूँ ही आते रहे ......!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यादों के दर्पण पर जमी धूल पर
हलके से आँचल फेरती हूँ मै ।
मेरे वर्तमान को भूल ही जाती हूँ,
खाती हूँ झिडकियाँ ।

सुन्दर भाव ..स्मृतियों में ऐसा ही होता है ..

sandhyagupta ने कहा…

अत्यंत सुन्दर और भावपूर्ण.शुभकामनायें.

रंजना ने कहा…

मर्मस्पर्शी रचना...

ZEAL ने कहा…

भावुक कर देने वाली सुन्दर प्रस्तुति ।

उपेन्द्र नाथ ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कविता.........
आपका लिंक मिला तथा आप से आप के ब्लाग पर मिलकर काफी खुशी हुई। आभार

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून ने कहा…

वाह बहुत सुंदर भाव. सुरूचिपूर्ण रचना.

Asha Joglekar ने कहा…

इस पोस्ट पर आप सब का इतना ढेर सारा स्नेह पाकर मै धन्य हुई । कृपा बनाये रखिये ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

यादों के दर्पण पर जमी धूल पर
हलके से आँचल फेरती हूँ मै ।
मेरे वर्तमान को भूल ही जाती हूँ,...

ये सच है की हक़ीकत बार बार खैंच लेती है अपनी और ... पर सपने देखना भी बुरा नही ... कुछ पल को दिल में खुशी का एहसास होना गुनाह तो नही ..... अपने बहुत ही कोमल भावनाओं को हक़ीकत से जोड़ दिया है ... लाजवाब ...

ज्योति सिंह ने कहा…

यादों के दर्पण पर जमी धूल पर
हलके से आँचल फेरती हूँ मै ।
मेरे वर्तमान को भूल ही जाती हूँ,
खाती हूँ झिडकियाँ ।
आँचल को खींचते माँ माँ कहते छोटे बच्चे को
यकायक सीने में भींच लेती हूँ मै...
waah aasha ji is baar to bahut sundar likha hai .

mehhekk ने कहा…

yaadon aur yatharth mein mann ki kashmakash bahut sunder tarike se bayan huyi hai,waah.

रंजू भाटिया ने कहा…

बहुत पसंद आई यह रचना ..देर से पढ़ी यह