गुरुवार, 27 सितंबर 2007

बुरे फँसे बेचारे




मौज और मस्ती
तब जो थी सस्ती
जोशे जवानी
सारी मनमानी

होटल सिनेमा
लंच डिनर खाना
प्यारी प्यारी बीवी
नया नया टीवी

जब जो चाहा
वो ही तो पाया
इससे ही पनपा
प्यार जो इनका

गुल खिला प्यारा
मुन्ना हमारा
तब से है हाथ में
और है साथ में

दूदू की बोतल
और पेसीफायर
बैग में डाय़पर
और थोडे वायपर

थोडे से बिब
और दो चार पोंछे
कहाँ गये मस्ती के
दिन हम यूँ सोचें

नींद गई रातकी
चैन दिन का गया
यार इनका तो
हाल बुरा हो गया

कहाँ थे ये
और पहुँचे कहाँपर
छोडो जी इन्हें
इनके ही हाल पर



आज का विचार
यत्न, यत्न, यत्न.........यश ।

स्वास्थ्य सुझाव
खाना ... दिन में भरपेट रातमें आधा पेट।
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