शनिवार, 26 जुलाई 2014

धुंधली सी उम्मीद


राह खत्म है फिर भी चल रहा हूँ मै
कागज़ नही पर शब्द ही छलका रहा हूँ मै।

आँखों के आँसू सूख गये बडे दिन हुए,
दिल में कहीं नमी की, खोज में रहा हूँ मैं.

कैसे कोई किसी से इतनी बेरुखी करे,
सवाल का जवाब नही पा रहा हूँ मै।

मैने तो अपनी ओर से कोशिश भी की बहुत,
उस बंद दर को कहाँ खुलवा सका हूँ मै।

एक धुंधली सी उम्मीद कि शायद खुलेगी राह,
इसी आस को दिल में बसाये जा रहा हूँ मै.






चित्र गूगल से साभार।

13 टिप्‍पणियां:

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

इस रचना में भाव स्पष्ट हैं लेकिन इसमें गज़ल के शिल्प के दृष्टिकोण से कई कमियाँ हैं! इसलिये इसे गज़ल न मानते हुए भी पसन्द आई!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

एक धुंधली सी उम्मीद कि शायद खुलेगी राह,
इसी आस को दिल में बसाये जा रहा हूँ मै...
ये आस बहुत जरूरी है .. मन में कहीं कोई दीप जरूर जलता हुआ रहना चाहिए ... जीवन के लिए ...

hem pandey(शकुनाखर) ने कहा…

आशा ही जीवन है । राह अवश्य खुलेगी ।

sushmaa kumarri ने कहा…

खुबसूरत अभिवयक्ति.....

Asha Joglekar ने कहा…

बिहारी जी गज़ल का ज्ञान तो मुझे है नही पर आप ठीक कहते हैं । इसको कविता (या नज्म) ही कहना चाहिये

Suman ने कहा…

मुझे गजल का कोई ज्ञान नहीं लेकिन रचना सटीक लगी !

ओंकारनाथ मिश्र ने कहा…

उम्मीद है, तो सब कुछ है.

Arvind Mishra ने कहा…

देखिये :-)
अच्छी कविता वह जो निकले कहीं से और शोभित हो कहीं और

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

सुन्दर पंक्तियाँ
आशा और विश्वास लिए

Vinay ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति

virendra sharma ने कहा…

मैने तो अपनी और से कोशिश भी की बहुत,
उस बंद दर को कहाँ खुलवा सका हूँ मै।
"और "के स्थान पर ओर करलें।
बहुत सशक्त अभिव्यक्ति व्यंग्य विडंबन संसिक्त अर्थ पूर्ण ,मारक।

Asha Joglekar ने कहा…

धन्यवाद वीरेंद्र जी, गलती सुधार ली है।

संजय भास्‍कर ने कहा…

सुन्दर पंक्तियाँ