गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

बुराई का अंत



आज मारना है रावण को, पर आज ही क्यूं
यहां तो रावण अब भरे पडे हैं
रोज ही मनाओगे दशहरा तब  शायद
हो बुराई का अंत
तब ही मन करेगा अयोध्या लौटने को
मेरे आने तक भरत ने तो निष्कलंक रखी थी अयोध्या
तुम क्यों तुले हो इसे मलिन करने को
यहां के लोग तो नही चाहते ये सब
जिस कुर्सी के मोह में लिप्त हो, वही छोड दी थी
भरत ने, पाकर भी नही अपनाई थी
कुछ भी नही सीखे हो, सीख पाओगे भी नही
सिर्फ आग मत लगाओ
राख ठंडी हो गई है कुरेद कर हवा न दो
अपने आप खिल पडेंगे सद्भाव के फूल
जरा स्नेह का जल तो डालो ।

36 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

अपने आप खिल पडेंगे सद्भाव के फूल
जरा स्नेह का जल तो डालो ।


-बहुत सही...

ZEAL ने कहा…

.

...राख ठंडी हो गई है कुरेद कर हवा न दो अपने आप खिल पडेंगे सद्भाव के फूल जरा स्नेह का जल तो डालो ...


काश लोग समझ पाते की इंसानियत , सद्भाव और भाईचारा क्या है ।

बेहद सुन्दर और सामयिक प्रस्तुति ।

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महेन्‍द्र वर्मा ने कहा…

कविता के माध्यम से बहुत सार्थक संदेश दिया है आपने...यह संदेश जन-जन तक पहुंचे...बधाई।

निर्मला कपिला ने कहा…

सुन्दर सन्देश। लोग समझें तब ना। शुभकामनायें।

Unknown ने कहा…

सही कहा आपने!...रावण एक नही है....करोडॉ रावण आतंक जमाए हुए है!...इनका खात्मा करना भी जरुरी है!...उत्तम रचना!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...
दुर्गाष्टमी और विजय दशमी की शुभकामनाएं.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

स्नेह के जल से कई रावण राम हो जायेंगे।

शरद कोकास ने कहा…

बढ़िया सन्देश

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...
दुर्गाष्टमी और विजय दशमी की शुभकामनाएं.

mridula pradhan ने कहा…

wakaee.'ghar-ghar men rawan baitha hai, itne ram kahan se laayen?

sandhyagupta ने कहा…

दशहरा की ढेर सारी शुभकामनाएँ!!

M VERMA ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
M VERMA ने कहा…

राख ठंडी हो गई है कुरेद कर हवा न दो
अपने आप खिल पडेंगे सद्भाव के फूल
सद्भाव का सुन्दर सन्देश ..

ZEAL ने कहा…

.

..सिर्फ आग मत लगाओ
राख ठंडी हो गई है कुरेद कर हवा न दो
अपने आप खिल पडेंगे सद्भाव के फूल
जरा स्नेह का जल तो डालो ...

मंत्रमुग्ध करती हैं ये पंक्तियाँ ।

आभार।

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राजभाषा हिंदी ने कहा…

सही कहा, ज़रा स्नेह का जल डाल कर तो देखिए, सद्भाव के फूल खिलेंगे ही। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
बेटी .......प्यारी सी धुन

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

अपने आप खिल पडेंगे सदभाव के फूल
जरा स्नेह का जल तो डालो ।

अकाट्य सत्य, पर लोग अनजान हैं कि यह अमृत तुल्य स्नेह का जल मिलता कहाँ हैं..........

अति सुन्दर विचारों से भरी यह कविता निश्चय ही प्रशंसा के योग्य है......

हार्दिक बधाई.....

चन्द्र मोहन गुप्त

Coral ने कहा…

आज मारना है रावण को, पर आज ही क्यूंयहां तो रावण अब भरे पडे हैं रोज ही मनाओगे दशहरा तब शायदहो बुराई का अंत

बहुत सुन्दर .....

Parul kanani ने कहा…

maulik aur sarthak abhivkti!

Suman ने कहा…

bahut sunder rachna..........

Rahul Singh ने कहा…

संदर्भ के सम्‍यक प्रयोग से प्रभावी अभिव्‍यक्ति.

रंजना ने कहा…

कितना सही कहा आपने....
अब तो रोज क्या हर पल एक रावन को मारें तो भी इनकी संख्या जल्दी ही समाप्त होने वाली नहीं.
रावन अब रक्तबीज की भांति प्रतिपल पनपे जा रहे हैं..

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

अपने आप खिल पडेंगे सद्भाव के फूल
जरा स्नेह का जल तो डालो ।


बहुत सुन्दर .....!!

संजय @ मो सम कौन... ने कहा…

क्या मैडम, इतना मुश्किल वाला रास्ता बताती हैं आप?
यही बढ़िया है न, साल भर खुद रावण बने रहेंगे और एक दिन माथे पर तिलक लगाकर जोर से रामचंद्र की जय बोलेंगे और रावण का पुतला जलायेंगे, हो गई डयूटी पूरी। काये कू खाली पीली स्नेह का जल डालें और सद्भाव के फ़ूल खिलायें। नहीं होने का ये सब।

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) ने कहा…

ji han asha ji , sneh ke jal ki hi kami hai. wo kami puri ho jaye to bat hi kuch aur hogi.

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar ने कहा…

आपने एक बहुप्रयुक्त एवं पारम्परिक कथ्य को छुआ है...उसमें नयापन लाने का प्रयास साफ़ दिखायी दे रहा है। फिर भी चाहूँगा कि इसी कविता को एक बार फिर लिखें...मेरा आशय है कि इस विषय को थोड़ा और विस्तार दिया जा सकता है, समकाल से जोड़कर।

अरुणेश मिश्र ने कहा…

सामयिक ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सही कहा ... इंसान अपने अंदर के रावण को नही जलाता कभी ....

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

आज मारना है रावण को, पर आज ही क्यूं
यहां तो रावण अब भरे पडे हैं
bahut hee sahi likha hai aapne...dil ko chhoo lene walee rachna badhayi

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

काश, रावण के पुतले के साथ बुराई का भी अंत हो जाता।

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सुनामी: प्रलय का दूसरा नाम।
चमत्‍कार दिखाऍं, एक लाख का इनाम पाऍं।

गिरीश बिल्लोरे मुकुल ने कहा…

जी
पर अब ये सम्भव नहीं
ताज़ा पोस्ट विरहणी का प्रेम गीत

mehhekk ने कहा…

अपने आप खिल पडेंगे सद्भाव के फूल जरा स्नेह का जल तो डालो bahut sunder,har insaan aise soche aur kare tho har mann ka ravan mar jaye.
AAPKO SAH PARIVAAR DIWALI KI BAHUT SHUBKAMNAYE.

Satish Saxena ने कहा…

दीवाली की शुभकामनाएं स्वीकार करें

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

..सिर्फ आग मत लगाओ
राख ठंडी हो गई है कुरेद कर हवा न दो
अपने आप खिल पडेंगे सद्भाव के फूल
जरा स्नेह का जल तो डालो ...

bahut hee sahi kaha hai aapne..kash aise hee sabhee log sochne lage

Unknown ने कहा…

सुंदर रचना, सुंदर प्रस्तुति...धन्यवाद! ...दिपावली की शुभ-कामनाएं!

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

उपेन्द्र नाथ ने कहा…

bahoot hi sahi bat kahi aap longo ne. ....har ravan ka aant hona jaroori hai.