बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

भौरों के कदरदान


फूलों से ही भौरों की पहचान  है
वरना इनके कहां कदरदान हैं ?
आदमी को चाहिये इन्सानियत़
उसके बिना क्या आदमी का मान है ?
हमने किस पत्थर से क्या मांगा भला,
मन की जो भी जान ले, भगवान है ।
नन्हे-मुन्नों पे न डालो बोझ तुम
इनका बचपन आजकल मेहमान है ।
तेरे मेरे बीच का ये फासला
मिट गया गर, एक दिल दो जान है ।
जो न मिट जाये वतन की राह में
वो क्या सच्चा वीर है, जवान है ?
तुम से जो बन पाये, तुम उतना करो
औरों की सोचो न , वे अनजान हैं ।
आस का होता क्या कोई अंत है,
कम न निकले, दिल के जो अरमान हैं ।
जैसे गुजरी है ये अब तक जिंदगी
आगे भी गुजरे ?  तू तो बस नादान है ।

36 टिप्‍पणियां:

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत ही खूबसूरती से आपने यादों के जुगनुओं को शब्दों में ढाला है....

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत गजब की रचना, सुंदर अति सुंदर.

Arvind Mishra ने कहा…

जो गुजरा खूब गुजरा और जो गुजरेगा वह गुजरे जैसा नहीं गुजरेगा ..
जीवन का मर्म समझाती बढियां कविता

M VERMA ने कहा…

आदमी को चाहिये इन्सानियत़
उसके बिना क्या आदमी का मान है ?

इंसानियत के बिना आदमियत कहाँ?

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा!

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत खूबसूरत !!

Alpana Verma ने कहा…

आस का होता क्या कोई अंत है,
कम न निकले, दिल के जो अरमान हैं ।
-बहुत सही लिखा है.

नन्हे-मुन्नों पे न डालो बोझ तुम
इनका बचपन आजकल मेहमान है ।
-वाह!बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ!
दार्शनिक पुट लिए हुए यह रचना बहुत अच्छी लगी.

Akanksha Yadav ने कहा…

आस का होता क्या कोई अंत है,
कम न निकले, दिल के जो अरमान हैं ।
जैसे गुजरी है ये अब तक जिंदगी
आगे भी गुजरे ? तू तो बस नादान है ।

....बेहतरीन भाव...सुन्दर अभिव्यक्ति...बधाई.
__________________________
"शब्द-शिखर' पर जयंती पर दुर्गा भाभी का पुनीत स्मरण...

Satish Saxena ने कहा…

हमने किस पत्थर से क्या मांगा भला,
मन की जो भी जान ले, भगवान है ।
नन्हे-मुन्नों पे न डालो बोझ तुम
इनका बचपन आजकल मेहमान है ।

आनंद आ गया ....

महेन्‍द्र वर्मा ने कहा…

जैसे गुजरी है अब तक ये ज़िदगी,
आगे भी गुजरे, तू तो बस नादान है।

सुंदर मनोभावों के साथ सुंदर ग़ज़ल...बधाई।

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

Man ko chhu gaye aapkee bhav.

मनोज कुमार ने कहा…

जीवन दर्शन से भरी पंक्तियां काफ़ी प्रेरित कर गईं। बहुत अच्छी प्रस्तुति।
मध्यकालीन भारत-धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-२), राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

P.N. Subramanian ने कहा…

अब तक सब ने सब कह दिया. "आस का होता क्या कोई अंत है,
कम न निकले, दिल के जो अरमान हैं" बेहद सुन्दर रचना.

निर्मला कपिला ने कहा…

तेरे मेरे बीच का ये फासला
मिट गया गर, एक दिल दो जान है ।
जो न मिट जाये वतन की राह में
वो क्या सच्चा वीर है, जवान है ?
बहुत सुन्दर लगी आपकी रचना। बधाई।

ZEAL ने कहा…

फूलों से ही भौरों की पहचान है
वरना इनके कहां कदरदान हैं ?
आदमी को चाहिये इन्सानियत़
उसके बिना क्या आदमी का मान है ?

सच कहा आपने। जिसमें इंसानियत न हो, वो इंसान नहीं।

.

बेनामी ने कहा…

हमने किस पत्थर से क्या मांगा भला,
मन की जो भी जान ले, भगवान है ।'
बिलकुल सही कहा आपने.
'नन्हे-मुन्नों पे न डालो बोझ तुम
इनका बचपन आजकल मेहमान है।'
टीचर हूँ जानती हूँ पेरेंट्स के नाते भी हम सब जानते है.
एकदम नई बात ली है गज़ल में.
वैसे एक बात कहू? मेम!
'आस का होता क्या कोई अंत है,
कम न निकले, दिल के जो अरमान है
पढ़ कर एक पुराना शेर याद आ गया.हमारी रचनाओ में हम बोले बस,दूसरा क्यों बोले?

hem pandey ने कहा…

जैसे गुजरी है ये अब तक जिंदगी
आगे भी गुजरे ? तू तो बस नादान है ।

- आने वाली जिन्दगी और भी बेहतर हो |

Asha Joglekar ने कहा…

आपने ठीक कहा इंदु जी ।
गालिब का शेर है शायद,
हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान मगर फिर भी तो कम निकले ।

पर मैने इसके उलट बात कही है कि कम नही निकले दिल के अरमान । लफ्ज़ गालिब जी के ही हैं आपने सही पकडा ।

बेनामी ने कहा…

मेम!ये आपका बडप्पन है कि आपने इस बात को स्वीकार और कोई होता तो अब तक मेरे खिलाफ अपने ब्लॉग पर पूरा एक आर्टिकल पोस्ट कर चूका होता.परिपक्व सोच और गंभीरता शायद इसी को कहते है.थेंक्स.
यूँ भी मेरा अपना सोचना है कि टिपण्णी का मतलब 'वाह वाह' 'बहुत खूब' 'दिल को छू गया' लिख देना ही नही होता.कम से कम हमने जो लिखा है उसे किसी ने गंभीरता से पढा इतना तो आभास होना ही चाहिए.
आप मुझे 'गाइड' करेंगे तो मुझे खुशी होगी.गाइड यानि ड्रा बेक्स बता कर सही करवाना.है न?

S.M.Masoom ने कहा…

फूलों से ही भौरों की पहचान है
वरना इनके कहां कदरदान हैं ?
आदमी को चाहिये इन्सानियत़
उसके बिना क्या आदमी का मान है

अति सुंदर

daanish ने कहा…

जो न मिट जाये वतन की राह में
वो क्या सच्चा वीर है, जवान है ?

kathya aur shilp ke hisaab se
har panktee bahut hi shaandaar bn padee hai ...

abhivaadan svikaareiN .

ARUN MISHRA ने कहा…

अच्छे भाव,सुन्दर अभिव्यक्ति|साधुवाद!
- अरुण मिश्र

दिगम्बर नासवा ने कहा…

हमने किस पत्थर से क्या मांगा भला,
मन की जो भी जान ले, भगवान है ...

बहुत ही निर्मल मन से लिखी रचना है .... बहुत सुंद्र अभिव्यक्ति ...

शोभना चौरे ने कहा…

नन्हे-मुन्नों पे न डालो बोझ तुम
इनका बचपन आजकल मेहमान है
ये पक्तियां दिल को छु गई
बहुत सुन्दर रचना |
नवरात्रि की शुभकामनाये |

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ।

Unknown ने कहा…

फूलों से ही भौरों की पहचान है
वरना इनके कहां कदरदान हैं ?
आदमी को चाहिये इन्सानियत़
उसके बिना क्या आदमी का मान है ?

जीवन की सच्चाई को थोडेसे शब्दों में बयां किया है आपने आशाजी!....बहुत सुंदर रचना!....आपने मेरी कहानि' अंधकार से आती आवाज ' की टीप्पणी में जो सवाल पूछा है,वह अति गहनता लिए हुए है!....इसका तार्किक जवाब शायद कोई भी नहीं दे पाएगा!...बहुत अच्छा लगा!

Umra Quaidi ने कहा…

सार्थक लेखन के लिये आभार एवं “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव भी जीते हैं, लेकिन इस मसाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये यह मानव जीवन अभिशाप बन जाता है। आज मैं यह सब झेल रहा हूँ। जब तक मुझ जैसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यही बडा कारण है। भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस षडयन्त्र का शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल दो मिनट का समय हो तो कृपया मुझ उम्र-कैदी का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आप के अनुभवों से मुझे कोई मार्ग या दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये।
http://umraquaidi.blogspot.com/

आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”

मनोज कुमार ने कहा…

जीवन दर्शन से सिक्त इस रचना पर कहना है
मकानों के थे या ज़मानों के थे
अजब फ़ासले दर्मियानों के थे
सफ़र यूं तो सब आस्मानों के थे
क़रीने मगर क़ैदख़ानों के थे

सूफ़ी आशीष/ ਸੂਫ਼ੀ ਆਸ਼ੀਸ਼ ने कहा…

सुन्दर! विचारोत्तेजक!
आभार!
आशीष
--
प्रायश्चित

Rohit Singh ने कहा…

कितनी सही बात कही है आपने। कद्रदान न हो तो कला का क्या मोल। भौरें न हो तो खुशबू का क्या मोल।

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

फूलों से ही भौरों की पहचान है
वरना इनके कहां कदरदान हैं ?
आदमी को चाहिये इन्सानियत़
उसके बिना क्या आदमी का मान है ?

बहुत ही सुंदर भाव..... विचारणीय

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून ने कहा…

अच्छी रचना है जी.

ZEAL ने कहा…

तुम से जो बन पाये, तुम उतना करो
औरों की सोचो न , वे अनजान हैं ।
आस का होता क्या कोई अंत है,
कम न निकले, दिल के जो अरमान हैं ।
जैसे गुजरी है ये अब तक जिंदगी
आगे भी गुजरे ? तू तो बस नादान है ।


kaash sab samajhte ye baat ...

.

mridula pradhan ने कहा…

bahut achchi lagi aapki kavita.

S.M.Masoom ने कहा…

बहुत दिनों बाद कोई पढने लायक सामग्री मिली. धन्यवाद्. आप सब को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीकात्मक त्योहार दशहरा की शुभकामनाएं. आज आवश्यकता है , आम इंसान को ज्ञान की, जिस से वो; झाड़-फूँक, जादू टोना ,तंत्र-मंत्र, और भूतप्रेत जैसे अन्धविश्वास से भी बाहर आ सके. तभी बुराई पे अच्छाई की विजय संभव है.

mehhekk ने कहा…

हमने किस पत्थर से क्या मांगा भला,
मन की जो भी जान ले, भगवान है ।
bilkul sahi,sachhe sunder shabd.waah.