रविवार, 20 जून 2010

सीढी


क्यूं करोगे संतोष आधी रोटी से,
छीन लो अगर तुमको दो चाहिये ।
तीन की या चार की भी हो सकती है जरूरत,
तुम्हारी उम्र और काम के हिसाब से,
नही कर लेना है सबर अब ।
अपनी जरूरत तो पूरी करना ही है,
ज्यादा की भी चाह रखनी है ।
देखना है नये सपने ।
सपने ऊँचाइयों के,
शिखरों के,
नीले आसमान के,
सितारों से आगे के ।
हक है ये तुम्हारा
कोई खैरात में नही मांग रहे हो।
करो मेहनत, बढो आगे
मंजिल की और ।
एक के बाद दूसरी,
तीसरी और चौथी मंजिलें
तय करो और पाते जाओ ।
छोटा पड जायेगा आसमान
तुम्हारी आशाओं के आगे ।
एक काम और करना
सीढी को लात मार कर नीचे नही गिराना ।
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