शुक्रवार, 4 जून 2010

वतनी



इस जिंदगी को, जीने का सलीका क्या है ?
मै जानता नही, कोई मेरे सरीखा क्या है ।
हम अपने आप को, देखें जो मन के शीशे में ,
जान जायेंगे असल क्या, और दिखावा क्या है ।





वो जो करते थे, दावा-ए-मुहब्बत हमसे,
अब हाल ये कि सलाम क्या और दुआ क्या है ।
मैं जो इतना हूँ परेशान, तो भला क्यूं कर ,
क्यूं सोचता हूँ, कि ये हाल वतन का क्या है ।
ये जो हैं चाट रहे देश, लगे दीमक से,
इन नेताओं का धरम क्या है औ ईमाँ क्या है ।
नेता तो मान लिया बस हैं पांच सालाना,
इन बाबुओं को जनम भर का मिला ठीका है ।
जब आप-हम ही न सोचें वतन के बारे में,
वतनी कहलाने का फिर अपना तरीका क्या है ।
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