रविवार, 7 जून 2009

याद आया


वो गुज़रा जमाना याद आया
वो पुराना फसाना याद आया।
यारों जो हमारा साझा था
दोस्ती का वो तराना याद आया ।
वो खींचना टांगे बंदों की,
उनकी चुस्ती ढहाना, याद आया।
वो बनाना कागजों के तीर
और लडकियों पे निशाना याद आया ।
वो देना जाँ भी दोस्ती के लिये
और वादे निभाना याद आया ।
किताबों को रख के सिरहाने
लेना, सपने सुहाने याद आया ।
उनका आने का वादा करके फिर
वो बहाना बनाना याद आया ।
वो जयप्रकाशजी का आंदोलन
और नारे लगाना याद आया ।
दूध में पानी ही मिलाता था
वो प्यारा सा ग्वाला याद आया ।
दोस्तों, अब हम क्या कहें तुमसे
कितना वो जमाना याद आया ।
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