सोमवार, 3 दिसंबर 2007

अंतक की असलियत

मृत्यु, मैने तुम्हे देखा है,
जाना है, समझा है करीब से
तुम वो नही हो जो कवियों और संतों ने
हमे बहलाने के लिये बताया था ।

नही हो तुम कोमल भावों वाले वर
जो सजधज कर आता है अपनी प्रिय
दुल्हन का वरण करने
नही हो तुम वह जिसके लिये हमारी
आत्मा नव-वधु की तरह घबराई,
शरमाई और उत्सुक होती है
नही हो तुम हमारी मुक्ति का द्वार

तुमतो डकैत हो, जो इस आत्मा वधु के
घर को खंड खंड विखंड करते हो
अपनी विषैली साँसों से से दूषित करते हो
अपने फफूंदी औजारों से गला गला कर
क्षत-विक्षत करते हो

और फिर इस घर से उसे, नोच कर,
खसोट कर ले जाते हो
परिवार जनों को बिलखता, टूटा और आहत छोडकर
किसी बलात्कारी की तरह

जान गये हैं तुम्हारी असलियत
तुमको देख लिया, जान लिया, समझ लिया करीब से ।

श्रध्दांजली
हमारे परम स्नेही एवं मित्र श्री ओमप्रकाश रस्तोगी जी कल सुबह साढे दस बजे
काल कवलित हो गये । इतने अच्छे इन्सान कम ही देखने को मिलते हैं।
अपने परिवार जनों की उनकी हर मुसीबत में सहायता करने वाले रस्तोगी जी
अपने पडोसियों से भी सौहार्दपूर्ण एवं सहायक संबंध बनाये रखते थे ।

पिछले आठ सालों से वे एक असाध्य और दुर्धर रोग से किसी बहादुर योध्दा की तरह
जूझ रहे थे और किसी की भी हमदर्दी उन्हें गँवारा नही थी । किसी भी संबंधी को
बताये बिना उस रोग से टक्कर देते हुए उन्होने अपने सारे दायित्वों की पूर्ती की ।
उनके इस संघर्ष की साथी रहीं उनकी हमसफर मीनाजी । इसी संघर्ष के
हम भी साक्षी रहे हैं । उन्हें हम सब की और से भावभीनी श्रध्दांजली।
उनके इसी संघर्ष और उसकी समाप्ती पर सादर थी ये कविता।


आजका विचार
किसी वस्तु या व्यक्ती का अभाव ही दु:ख है ।

स्वास्थ्य सुझाव
रात के पहले पहर की नींद हमें दुगना विश्राम देती है ।
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