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गुरुवार, 29 मई 2014

मालगुंड (कोकण) की सैर




इस बार वापिस आने के बाद महीने के अंदर ही हमने घूमने का कार्यक्रम बना लिया। मालगुंड, पुणे,  पनवेल, ठाणे और वापिस।
मालगुंड- गणपतिपुळे के साथ ही लगा हुआ कोकण का एक गाँव जो अभी भी अपने गांव-रूप को जतन किये हुए है। मिलिंद और अचला ( मेरा छोटा भाई और भावज) ने वहीं अब अपना घर बसा लिया है। रांची में बहुत साल किर्लोस्कर इंजिनों की मरम्मत और बिक्री का काम करने के बाद अवकाश का शांत सा बसेरा।
इन दोनों के वहां जाकर बसने का एक कारण अचला की बहन अलका और बहनोई श्री वैद्यजी की मालगुंड में जा कर बसना था।  वे चाहते थे संग साथ तो बस उन्होने ही जमीन खरीदवाई और मकान भी बनवा दिया। मिलिंद अचला को सिर्फ २-४ बार वहां चक्कर लगाने और चेक काटने की जरूरत पडी और चाभी उनके हाथ में। सुंदरसा  दो तल्ला मकान २ शयनागार ऊपर दो नीचे, नीचे ही बडा सा हॉलनुमा ड्रॉइंगरूम कम लिविंग रूम कम किचन और डायनिंग। ऊपर बडी सी छत और नीचे बाहर अहाता पेड पौधे लगाने के लिये। सडक पार करते ही एक बडी सी केवडे की झाडी और झाडी के तुरंत  बाद सुंदर सा रत्नाकर यानि समंदर। यह मै इस लिये बता रही हूँ क्यूं कि हम रहते हैं दिल्ली जैसे महानगर के एक फ्लैट में और ये सब कुछ कल्पना ही है। बहर हाल हमारे सफर पर आते हैं।
रत्नागिरि स्टेशन पर जब हमारी त्रिवेंद्रम राजधानी कोई २२ घंटे के सफर के बाद पहुँची तो मिलिंद अचला को स्टेशन पर पाया वे गाडी लेकर हमें लेने आये थे क्यूं कि रत्नागिरि से मालगुंड के लिये वही सही था। बस सेवा नही के बराबर तो गाडी या टेम्पो ही हैं जाने आने के साधन।
हमारा सामान जिसे उठाने के दिल्ली में कुली ने ६०० रुं लिये थे मालगुंड में महज १२० रूं लिये। इस के बाद हम मिलिंद की ईको में बैठ कर चल पडे मालगुंड की और। कोई एक घंटे की सुखद यात्रा जिसमें बराबर आपको सागर दर्शन होता रहता है । यह किसी तरह कैलिफोर्निया की Seventeen miles scenic drive से कम न थी । घर पहुँचे नहा धो कर खाना खाया और आराम किया। शाम को गये बीच पर घूमने लंबे खाली बीच पर दो चक्कर लगाये और सूर्यास्त का बहुत सुंदर दृष्य का आनंद लिया। सूर्यदेव धीरे धीरे उत्तरी गोलार्ध की और प्रस्थान कर रहे थे। क्षितिज पर जहां आकाश और सागर का मिलन होता सा लग रहा था, हम प्रतीक्षा में थे कि सूर्य देव अब सागर में डुबकी लगा कर उत्तरी गोलार्ध में कहीं उदित हो रहे होंगे, उनके इसी ही रूप को देख कर कवि ने कहा होगा,
उदये सविता रक्तः रक्तश्चास्तमने गतः
संपत्तौच विपत्तौच महताम् एकरूपता।
हमने कुछ फोटो भी क्लिक किये।
एक मिलिंद के हथेली पर सूरज का भी लिया था पर कहीं खो गया। ( CLICK VDO  MVI 0044)
जाते ही हमने मिलिंद से कह दिया कि हम तो कोकण दो तीन बार घूम चुके हैं, तो इस बार इरादा सिर्फ
सागर किनारे रहने का आनंद उठाने का है । रोज सुबह उठते ही चाय पान के बाद हम पहुंच जाते बीच पर। मिलिंद-अचला ओर अलका तथा वैद्य साहब की तो यह रोज की ही दिनचर्या थी।तो दूसरे दिन सुबह हम पहुंचे बीच पर तो सागर देख कर ही आनंद आ गया। (CLICK VDO  MVI 0056)
 हर दिन सागर का अलग ही रूप होता था एक दिन तो हमने इतने सी गल्स देखे कि मज़ा आ गया। आप भी आनंद उठायें। (CLICK VDO  MVI 0964 )
CLICK VDO  MVI 0965
CLICK VDO  MVI 0966
 मिलिंद को फिर भी चैन न था । रोज़ ही शाम को गाडी निकाल कर कभी कोई बीच तो कभी किसी मंदिर का प्रोग्राम बन ही जाता था। वैसे भी कोंकण में समंदर और मंदर ही हैं देखने को और है सम्पन्न प्रकृति जो हर दिन अपना नया रूप लेकर प्रस्तुत होती है। सागर को ही लें वह हर दिन अलग दिखता है, सुबह, शाम, दोपहर भी अलग दिखता । नारियल, आम और काजू के पेड और काजू तथा आम के फूलों की खुशबू एक अदभुत वातावरण की सृष्टि करती थी। इन फूलों को हिंदी में बौर तथा मराठी में मोहर बोलते हैं।
ऐसे ही एक दिन मिलिंद हमें जयगड के गणेश मंदिर ले गया। ये मंदिर जिंदल स्टील एन्ड पॉवर कंपनी के इलाके में है। बहुत ही सुंदर बनाया है। मंदिर का परिसर साफ सुथरा है तथा चारों तरफ बगीचा है जिसमें रंगबिरंगे फूल खिल रहे थे और तरह तरह के पेड  पौधे भी अपनी हरियाली बिखेर रहे थे। मंदिर के अंदर की गणेश प्रतिमा ने तो मन मोह लिया। । मन में अथर्वशीर्ष का गणेश वर्णन तैरने लगा।
एकदंतम् चतुर्हस्तम् पाशमांकुशधारिणम,
रदंचवरदम् हस्तै बिभ्राणम् मूषकध्वजम्।
रक्तम् लंबोदरम् शूर्प कर्णकम् रक्तवाससम्,
रक्तगंधानुलिप्तांगम् रक्तपुष्पैसुपूजितम।
बहुत देर तक मंदिर में ही रहे फिर चारों तरफ चक्कर लगाया, मन बहुत प्रसन्न था लगा कि शाम सार्थक हो गई । काश कि हमारे सारे मंदिरों का रख-रखाव ऐसा ही हो।  (CLICK VDO  विडियो ००६१)
रोज जब हम बीच पर टहलते मेरी आंखें रत्नाकर के द्वारा फेके गये रत्नों यानि विभिन्न प्रकार के शंख, सीपियां और दूसरे समुद्री जीवों के  अवशेषों की तलाश में रहतीं। इसमें अचला की बहुत मदद होती थी. उसकी आँखें इस कार्य के लिये काफी प्रशिक्षित थीं। मेरे लाये हुए रत्नों में से कुछ की तस्वीरें तो मै आपको दिखा ही सकती हूँ। (CLICK VDO  विडियो MVI 968)
सोला तारीख को दत्त जयंती थी । मिलिंद ने कहा, यहां गांव के दत्तमंदिर में जन्मोत्सव होता है देखोगी, मैने कहा,” नेकी और पूछ पूछ। और इस तरह हम शाम को गांव के मंदिर जा पहुँचे। मंदिर सुंदर ढंग से सजाया गया था और ठसाठस भरा था, जैसे सारा गांव उमड पडा हो। यही हकीकत थी। गाँव के सारे लोग वहीं थे।
पहले तो दत्तगुरु के भजन हुए। फिर नामस्मरण हुआ, दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा। फिर दत्त जन्म हुआ। जैसे सचमुच हुआ हो इसी तरह औरतों नें उन्हें पालने में डाल कर झूला झुलाया, लोरियां गाईं । जन्मोत्सव के पेडे बाँटे गये और नामकरण हुआ। फिर  नवजात दत्तात्रय को दर्शन हेतु गोदी में उठा कर हर भक्त के पास ले जाया गया। यह सब मेरे लिये अनोखा था, लगा गोपाल नीलकंठ दांडेकर जी के किसी उपन्यास में मेरा प्रवेश हुआ है और में उसका एक हिस्सा बन गई हूँ। अद्भुत अनुभव। फिर दत्तात्रय जी  की आरती के बाद हम सब विदा हुए। बहुत ही आग्रह के साथ हमें दूसरे दिन के खाने का (पारणं) न्योता मिला पर हमारा अन्य कार्यक्रम था तो हम इसका आनंद नही उठा पाये। रात का वक्त होने से हम फोटो नही खींच पाये इसका मलाल रहेगा।  रात को छत पर गये और चांद देखा मिलिंद गुनगुनाया चांद फिर निकला और सुरेश ने चांद को कैमरे में कैद कर लिया।(CLICK VDO  विडियो MVI 1034)
फिर एक दिन मिलिंद ने कहा चलो आज मालगुंड के सारे मंदिर घुमाता हूँ तुम्हे । और हम गांव देवी,
विठ्टल मंदिर, राम मंदिर तथा एक अलग सा मंदिर जिसमें कई देवी देवताओं की मूर्तियां थीं। जाखा देवी, चंडी देवी, रवळनाथ, शिव आदि (CLICK VDO  विडियो 1006&7)
राम मंदिर छोटासा था किन्तु मूर्तियां बहुत सुंदर थीं। हमने वहां रामरक्षा का पाठ भी किया। (CLICK VDO  विडियो विडियो MVI1027)
 शिव मंदिर तो हमने पहले भी देखा था वहां का रख रखाव और मंदिरों के मुकाबले ज्यादा अच्छा है। आप भी देखें (CLICK VDO  विडियो mvi 1028)
अचला रोज़ कुछ न कुछ खास बनाती और मिलिंद अपने चुटकुले सुनाता या फिर बांसुरी बजाता।  आप भी सुनें बांसुरी की धुन। (CLICK VDO  विडियो MVI 991&992)
मिलिंद के वहाँ से नेवरे गांव बहुत पास था वह हमारे मामा (गाडगीळ) लोगों के पूर्वजों गांव था तो  मिलिंद ने कहा चलो मामा के गांव चलते हैं। वहां गये वहां पर गजानन महाराज का अच्छा सा मंदिर है जहां हर साल उत्सव होता है। पर अब वहां हमारे मामा के गोत्र का कोई भी व्यक्ति नही रहता। सुन कर बडा अजीब लगा कैसे सारे के सारे लोग अपना गांव छोड कर शहर चले जाते हैं। पिछली बार आये थे तो हम अपने गांव गये थे ( मायके का गांव घोळप) पर वहां कम से कम एक परिवार तो हमारे नाम और गोत्र का था और हेदवी गांव (ससुराल का गांव) में तो अभी भी काफी सारे जोगळेकर हैं।
यह सब करते और रोज बीच पर सैर करते, दिन पर लगा कर निकल गये और आखिर हमारा पुणे जाने का समय आ ही गया। पर मालगुंड में बिताया समय हमेशा याद रहेगा। और हाँ इस प्रवास की एक और उपलब्धी रही, अचला बहुत अच्छे रसगुल्ले घर में बनाती है तो मैने भी सीख लिये। कभी बताऊंगी आपको दाल चावल रोटी पर।

पुणे में विजूताई इनकी चचेरी बहन की और मेरी भाभी अर्चना की मेहमान नवाज़ी का लुत्फ उठाया। दो मराठी मूव्हीज देखीं उनमें से एक पितृऋण बहुत ही अच्छी लगी। मेरी दोस्त सुशीला से मिले खूब सारी कविताएं सुनी और सुनाई। पनवेल में मेरे भांजे रवी उसकी पत्नी जयू और मेरे जीजाजी से मुलाकात की। ठाणें में देवर प्रकाश और देवरानी जयश्री से मिले। मराठी नाटक देखें । खान पान तो सब जगह हर घर का स्पेशल रहा।  जनवरी ७ तारीख को वापिस दिल्ली पहुंचे और ठंड का वो कहर कि बस। पर घर तो घर ही है, ठंड हो या गरमी।

सोमवार, 4 मार्च 2013

भरतपुर पक्षी अभयारण्य




भरतपुर पक्षी अभयारण्य

दिल्ली में रहते रहते कोई 32 वर्ष हो गये हैं, इस दौरान कितनी बार मन में खयाल आया था कि एक बार भरतपुर जरूर जाना है । पर हो ही नही पाया । इस बार तो मैनें तय ही कर लिया था कि इस सर्दी में जाना ही है भरतपुर । तो हमने फरवरी को इस पर अमल कर ही लिया । हमारे साथ एडम भी था । सुहास का ये अमेरिकन विद्यार्थी हमारे यहां वह जब ११ वी १२ वी में पढता था तब पहली बार आया था । अब तो अमेरीकन एम्बेसी में काम करता है । अभी साउथ अफ्रीका में नियुक्त है और यहां दिल्ली काम से आया है । हमने पूछा, चलोगे भरतपुर, तो खुशी खुशी हामी भर दी । हॉटेल का बुकिंग भी कर दिया ।  तय किया था कि टैक्सी से ही जायेंगे ताकि हमारा वाहन हमारे साथ ही हो, और जरूरत पडी तो और कहीं जाने के लिये भी इस्तेमाल कर सकते हैं । भरतपुर दिल्ली  कोई 185 कि.मी. का रास्ता है ।
भरतपुर पक्षी अभयारण्य को महाराज केवलादेव ने बनवाया था । यहां पर हर वर्ष हजारों की संख्या में  प्रवासी पक्षी आते हैं और हमारे जैसे पर्यवेक्षक भी । इनमें से कुछ भारत के ही अन्य प्रदेशों से आते है तो कुछ विदेशों से । इसे १९८२ में राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा ( नेशनल पार्क ) मिला  और १९८५ में यह विश्व की धरोहरों (नेशनल हेरिटेज) में शामिल किया गया । 

हम सुबह साढे सात बजे चल पडे । मन में गीत गूंज रहा था पंछी बनू, उडती फिरूं, मस्त गगन में............... दो ढाई घंटे के सफर के बाद भूख लग आई तो रास्ते  रुके महारानी पेलेस नामक रेस्तराँ में । आलू पराठे का नाश्ता किया बढिया गरम गरम चाय पी और चल पडे आगे । कोई साढेबारह बजे हम भरतपुर के हमारे हॉटेल पहुंच गये
नाम है, सूर्या विलास पैलेस । सुंदर नया हॉटेल जो कि एकदम पुराने राजमहल के स्टाइल में बना हुआ । मैनेजर ने सुझाव दिया कि हम लंच करें और फिर जायें अभयारण्य । पर हमारे तो पेट के पराठे अभी हिले भी नही थे, तो हमने पहले अपने गंतव्य पर जाना ही उचित समझा । टिकिट लेकर कैमेरा से लैस हो हम पक्षी अभयारण्य में प्रवेश कर गये ।
एक गाइड कर लिया और दो साइकिल रिक्षा भी ले ली क्यूं कि पता चला कि ये अभयारण्य कोई २९ वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है । इसमें करीब १० वर्ग किलोमीटर पानी के सरोवर और दलदली इलाका है जहां पानी के पक्षी आते हैं ।  ऱिक्षा जब चल पडे तब पहले पहल कोई २-३ किलोमीटर तक कुछ दिखा ही नही ।


आगे जा कर दिखे रोज रिंग्ड पेराकीट यानि वे तोते जिनके नर गले में एक लाल रंग का छल्ला सा होता है । पर ये तो हमने नीमराना में भी देखे थे । एक छोटा धब्बेदार उल्लू ( स्पॉटेड आउलेट )
भी दिखा (फोटो) ।


एक जगह दिखा धब्बेदार बाज़ (स्पॉटेड ईगल)।


थोडा आगे जाने पर दिखा कि एक पेड गिरा हुआ था सूख भी गया था उसके कोटर में से गर्दन निकालता  हुआ मॉनिटर लिझार्ड  दिखा । (फोटो)



अब थोडा मज़ा आने लगा था । हमारा गाइड भी काफी जानकार था । हम आगे गये तो पानी का लम्बा सा तालाब लगा वहां बहुत सी काली बत्तखें तैर रही थीं । उनका नाम है कॉमन कूट । काफी शोर मचा रहीं थीं ।  ये दूसरे पक्षियों के साथ सर्दियों में तो सामंजस्य बठा लेती हैं पर प्रजनन के समय अपने रहने के स्थान के लिये काफी आक्रामक हो जाती हैं । ये यहां के ही पक्षी हैं । (फोटो)


आगे जा कर सफेद झक बगुले दिखे । इनकी गर्दन थो़डी लंबी होती है । गाइड ने बताया कि इनको इग्रेटस् कहते हैं ये बडे छोटे और मझौले आकार के होते हैं । बडे ईग्रेटस सुंदर और ग्रेसफुल होते हैं। इनको हेरॉन भी कहते हैं और होते भी हेरॉन कुल के हैं ।
 हेऱॉन की तरह ही ये उडान के समय अपनी गर्दन अंदर की और खींच कर उडते हैं । इनकी उडान भी देखनेवाली होती है और इनको दूसरे ईग्रेटस् से अलग करती है इनके सफेद रंग की वजह से ही इन्हे इग्रेटस् कहते हैं । (फोटो )

सफेद ईग्रेटस् के अलावा दूसरे हेरॉन्स भी दिखे जैसे कि ग्रे हैरॉन, पर्पल हैरॉन, पॉन्ड हेरॉन वगैरा ।


ग्रे हेरॉन पानी के आस पास रहने वाला पक्षी है यह दिखने में व्हाइट हेरॉन या लार्ज ईग्रेट जैसाही लगता है पर इसके बाहरी पर और पंख स्लेटी रंग के होते हैं । नीचे के पर बिस्किट के रंग के होते हैं यह बडा पक्षी है और करीब १०० से.मी. लंबा होता है । इसका सिर सफेद होता है पर उस पर एक काली पट्टी सी होती है । इनकी चोंच गुलाबी रंगत लिये पीले रंग की होती है ।

ग्रे हैरॉन

पर्पल हेरॉन को इसका नाम इसके पंखों की वजह से मिला है । नीले जामनी पंखों वाले इस पक्षी की चोंच लंबी और पीली होती है ।यह भी पानी का पक्षी है और मछलियां इसका आहार है । यह अफ्रीका योरोप और दक्षिण पूर्व एशिया में पाया जाता है ।

फिर दिखे पॉन्ड हेरॉन या  पैडी बर्ड । यह एक छोटे आकार का हेरॉन है और दक्षिणि ईरान, भारत, श्रीलंका, बांगला देश में पाया जाता है । यह सुंदर सफेद और भूरे रग के परों वाला होता है और इसके पीठ पर एक गहरे भूरे रंग की पट्टी होती है । चोंच पीली होती है । (फोटो)
     
नीलकंठ और किंगफिशर भी देखे ।  नीलकंठ को इंडियन रोलर भी कहते हैं । ये भारत में खूब पाये जाते हैं । इनके दर्शन शुभ माने जाते हैं । ये प्रवासी तो नही माने जाते पर
मौसमी बदलाव के साथ स्थलांतर करते पाये जाते हैं ।  इनके पर और सिर नीला होता है पर छाती भूरी होती है इनका कंठ नीला नही होता वरन भूरा ही होता है । (फोटो)

किंगफिशर बहुत सुंदर रंगबिरंगे परों वाला पक्षी है । चिडिया से थोडे बडे छोटी पूंछ वाले
किंग फिशर का सिर उसके देह के हिसाब से बडा होता है । इसकी चोंच लंबी और मजबूत होती है ताकि मछली आसानी से पकड सके । इसके पंख और पीठ नीले तथा पेट नारंगी रंग का होता है । ये पानी के अंदर का अपना शिकार बखूबी देख लेता है ।
(फोटो)

और थोडे आगे जाकर दिखे पर्पल हेन मूर या जामनी जल मुर्गी । यह मझोले आकार के पक्षी खूबसूरत भूरे,नीले, बैंगनी रग के पर वाले होते हैं ।  नर का रंग ज्यादा चमकीला तथा मादा का थोडा हलका होता है । ये कम पानी वाले क्षेत्र में घूमते पाये जाते हैं । ये स्वभावतः शरमीले होने से हम इन्हे दूर से ही देख पाये ।

  एक जगह खूब दूर से सुर्खाब भी दिखीं इन्हें गोल्डन गीज़ कहा जाता है । इनके पंख
सुनहरे रंग के होते हैं । 'सुर्खाब के पर 'वाली कहावत याद आ गई । हमारे गाइड के पास एक अच्छी सी दूरबीन भी थी जिससे पक्षी दूर भी हो तो अच्छा व्यू मिल जाता था । सिर्फ फोटो नही खिंच पाते थे ।

आगे जा कर देखे पेन्टेड स्टॉर्कस् । बहुत ही खूबसूरत रंगो वाले और बडे आकार प्रकार के ये प्रवासी पक्षी भरतपुर में प्रजनन के लिये आते हैं और सेप्टेंबर से मार्च तक यहीं डेरा डाले रहते हैं । जब तक कि बच्चे बडे होकर उडने लायक नही हो जाते । हमने माता पिता को बच्चों को उडने का प्रशिक्षण देते हुए देखा । इनकी पूरी की पूरी बस्तियां है यहां । (फोटो) 

ये बडे आकार प्रकार वाले पक्षी लंबी चोंच वाले होते हैं जो कि अंत में जा कर एक हुक की तरह मुड होती है जो आयबिस पक्षियों में भी पाई जाती है ।
पूर्ण वयस्क में सिर नारंगी लाल  होता है और दोनो पंखों पर काला सफेद धब्बों वाला आकर्षक  डिजाइन होता है  ये यहां दक्षिण भारत से प्रजनन के लिये आते हैं ।
इन सब पक्षियों को उनके प्राकृतिक वातावरण में देख कर बहुत आनंद आ रहा था ।  पर अब काफी थकान हो गई थी । जब कि हम तो रिक्षे पर थे । बेचारे रिक्षा चालक ! वापसी पर दोनो तरफ सांप की बांबियां बनी दिखीं और एक पर एक कोब्रा भी दिखा पर वह ठंड की वजह से काफी सुस्त था और धूप  सेंकने बांबी के ऊपर आकर लेटा था ।

 एडम ने एक फोटो क्लिक किया और हम वापस गेट पर आये और हमारी टैक्सी में बैठ कर वापिस अपने होटल । फ्रेश होकर चाय पी बिस्किट खाये और टीवी चला कर चैनल चेन्ज करते रहे । थोडी देर बाद नीचे जाकर खाना खाया । बहुत बढिया खाना था । पनीर पसंदा, नान, दाल चावल और आलू गोभी । थकान के कारण नींद जल्दी आ गई ।
हमें फिर से सुबह पंछी देखने जाना था ।

बहुतसे चित्र गूगल के सौजन्य से ।