रविवार, 17 अप्रैल 2016

अकाल









सूखी नदियाँ,सूखे ताल
प्यासे इन्साँ, जानवर बेहाल,
चटखी धरती, दरार दरार,
सूरज बरसाये अंगार।

जलते पांव, लतपथ काया
दूर तक जाना ही जाना
दूर से ही मिलेगा पानी
दो बूँद लाना ही लाना

साफ मिले या मिले मैला
प्यास तो बुझानी है,
पीने से चाहे मिले बीमारी,
पानी फिर भी पानी है।

कब तक तरसेंगी अंखियाँ,
बादल के दरस को
कब तक ये तन तरसेगा
बूंदों के परस को।

रोज प्रार्थना करते स्वर में,
हम मिलायें अपना भी स्वर
तब शायद पसीजेगा पत्थर
औ बनेगा कृपालू ईश्वर।

फिर छायेंगे बादल काले
चमकेगी  लकदक बिजली
बरसेगी जलधार धरा पर
तृप्त धरा हो खिली खिली।

चित्र गूगल से साभार।
हाल ही में मै पूना गई थी। महाराष्ट्र में पानी की भयंकर कमी के चलते ये विचार मन में आये।



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