सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

सब के लिये यही मनाते हैं।



मन के सूने कोने भी जगमगाते हैं
अंधेरे में कई दीप झिलमिलाते हैं।

देख कर बाहर की रोशन दुनिया
दुखियारे दिल भी बहल जाते हैं।

ये दिवाली, ये मिठाई, और फुलझडियाँ
कितने रंगीं सुंदर समय को लाते हैं।

मिटा के सभी मनमुटाव के जाले
मन को निर्मल आनंदमय बनाते हैं।

ये रोशनी सदा बसी रहे मन में
हम तो सब के लिये यही मनाते हैं।

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