रविवार, 13 जनवरी 2013

सागर की गहराई



सागर की गहराई तेरी
और गगन की व्यापकता
पृथ्वी का कण कण भी तेरा
और प्रकाश की समानता ।

ओस की नन्ही बूंद भी तेरी
प्रपात का आवेशावेग
आंसू और मुस्कान भी तेरे
और भावना का आवेग ।

नन्हे शिशु का मोहक चेहेरा
वृध्दों की सिलवटी त्वचा
हाथी हो या नन्हीं चींटी
दोनों में तू ही बसता ।

सांझ भोर का धुंधलका तू
और रात का साया भी
संतों का चिंतन भी तू है
संसारी की माया भी ।

मेरे मन में तो तू बसता
मै भी बसूँ तेर मन में
तेरे आशीष से सदा ही
मुक्त हो रहूँ जीवन में ।

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