सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

पुनः केरल- कोच्चि या कोचीन


कोच्चि या कोचीन –
दिन आंठवा –
आज जब हमारा भ्रमण परिवार कमरे से बाहर आया तो सामान लॉबी में रखा हुवा था जो कि पूर्व से दो तीन गुना ज्यादा था और आज कोच्चि में तो शॉपिंग ही शॉपिंग थी । आज अगर सिक्यूरिटी वाले कुत्ते हमारा सामान सूंघते तो मसालों की गंध से काफी कनफ्यूज़ हो जाते । तो नाश्ता कर के हम अपने बस में बैठे और चल पडे कोचीन की ओर । यह १४० किलोमीटर का प्रवास था आधा रास्ता पहाडी क्यूं कि मुन्नार जो पार करना था । रास्ते में एक छोटा सा प्रपात देख कर चाय कॉफी ब्रेक हुआ और लोग लगे फोटो खींचने (३६,३७) ।



इस के बाद करीब साढे बारह बजे हम कोचीन पहुंचे । यहां हमारा होटल था आइ. एम. ए. हाउस । आज हमें स्वयं ही सामान कमरों तक ले जाना था हमें पहले सेही आगाह किया गया ता कि कमरे छोटे हैं तो सामान ठीक से रखें । आज पहली बार यह कुछ अच्छा नही लग रहा था ।
कमरे में पहुँच कर देखा कि वे छोटे छोटे कमरे असल में स्यूटस् थे ( 1Bedroom apartment) । हम पांच लोगों के बीच से तीन स्यूटस् मिले थे मजा ही आ गया । हमारे पूरे प्रवास की यह सबसे सुखद व्यवस्था थी । यह इन्डियन मेडिकल असोसिएशन का गेस्ट हाउस था जो मेडिकल टूरिज्म के लिये प्रसिध्द है, तो सोचिये ।
खाने के बाद हम गये हाइकोर्ट जेट्टी की तरफ वहां नौका-भ्रमण का आनंद उठाया । एक जगह बोट को रोक कर हमने प्राचीन धर्मस्थल देखें । ये थे, सेंट फ्रांसिस चर्च, बालव्यट्टी द्वीप, डच पैलेस और एक सेनेगॉग और अजायब घर । इस द्वीप पर अब केवल ६ यहूदी परिवार रहते हैं । वापसी में चायनीज़ फिशिंग नेटस् भी देखे ।

नवां दिन – आज हमारे सफर का आखरी दिन था सब एक दूसरे की पूछताछ कर रहे थे पते ले रहे थे। इन आठ दिनों में हम अजनबियों को ये सचिन ट्रेवल्स कितने करीब ले आया था ।
आज हम सब गुरुवायूर के कृष्ण मंदिर जा रहे थे । यहां भी लुंगी साडी वाला ड्रेस कोड था । कुछ थके पडे लोग बस में ही बैठे रहे और हम जैसे उत्साही तपती धूप में चल कर मंदिर पहुंचे । एक किलोमीटर लंबी लाइन थी तो हमने परिसर में ही मस्तक दर्शन किया पर मै और जयश्री लाइन में भी लगे रहे तो कृष्ण को पा ही लिया और अच्छे से दर्शन हो गये । प्रकाश भाई साहब को दर्शन ना पाने का खेद रहा ।
दर्शन के बाद पेटपूजा की एक उडुपी रेस्तराँ में । खाने के बाद खरीदारी की और वापिस होटल । रास्ते में हम रुके पीलखाने जहां गुरुवायूर मंदिर के हाथी रखे जाते हैं मोटी जंजीरों से बांध कर । कुछ हाथी सूंड से शॉवर ले रहे थे तो कुछ मस्ती में नाच रहे थे । खूब मज़ा आया फोटो भी खींचे (४०,४१,४२ ) ।



हमें बताया गया कि यहां उन्हे उनके अनुचित व्यवहार के लिये दंडित किया जा रहा है, पर मुझे तो वे काफी खुश और मस्त लगे ।
वहीं से हम गये श्रीमद्शंकराचार्य जी के गांव कालडी (कलारी), उनका घर को देखने । यहां शंकराचार्य की माताजी का एक स्मृतिमंदिर भी है । यहां श्री शंकराचार्य जी के छोटी किंतु हिंदुधर्म के पुनरुत्थान के लिये सबसे महत्वपूर्ण जीवन यात्रा का वर्णन प्राप्त होता है (४३,४४) ।


कहते हैं यहां से नदी का प्रवाह बहुत दूर था तो शंकराचार्य जी ने अपनी माताजी की स्नानादि सुविधा के लिये नदी का प्रवाह मोड कर मंदिर की सीढियों तक लाया ।
दूसरी तरफ गुरुवायूर स्थित कृष्ण मंदिर के कृष्ण की काले ग्रेनाइट की मूर्ती भी है । यहां दर्शन करके प्रकाश भाई तो काफी खुश हुए और उनका गुरुवायूर में दर्शन न पाने का मलाल जाता रहा ।
फिर की खरीदारी और अपनी जेबों को खाली करके दूकानदारों की जेबों को भरपूर गरम किया । रात का खाना वापसी पर होटल में खाया । आज की शाम हमारी आखरी शाम थी । हम सब सचिन ट्रेवल्स को इस खूबसूरत ट्रिप के लिये धन्यवाद करना चाहते थे । हमारे कुछ साथियों ने सचिन ट्रेवल्स के प्रशंसा में चंद शब्द कहे (२०)।

मुझे भी मौका मिला कुछ कहने का । मेरा किसी ट्रेवल एजेन्सी के साथ टूर करने का यह पहला मौका था जो कि बडा सुखद रहा । खाने का इंतजाम तो बेहद अच्छा रहा सब तरह के व्यंजन होते थे जो अलग अलग लोगों के रुचि को ध्यान में रख कर बनाये जाते थे । शाकाहारी तथा मांसाहारी सभी खुश थे । सभी व्यक्ति स्वस्थ रहे । वापसी के प्रवास के लिये भी खाने के पैकेट साथ दिये । ज्येष्ठ नागरिकों का खास ख्याल रखा । सुबह पांच बजे निकलना था और इसके पहले करनी थी सारी पैकिंग ।
दूसरे दिन सुबह अपनी फ्लाइट पकड कर हम मुंबई वापस पहुंचे । मंदिरों में तस्वीरें खींचने की मनाही थी इसीसे वे तस्वीरें यहां नही हैं । पर हमने तो बहुत आनंद उठाया आपको मजा आया ?

(समाप्त)

सुहास (वन्दना)
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