मंगलवार, 21 सितंबर 2010

गणपति बाप्पा मोरया


आज गणेश विसर्जन का दिवस है । दस दिन के बाद गणपति का वापिस लौट जाना कितना खलता है पर वे तो जाते हैं क्यूं कि अगले साल लौट सकें । हमें अपनी आंखों से जतन करने वाले, सूंड से सहलाने वाले, हमारे अपराधों को अपने पेट में डाल कर हमारे ऊपर करुणा बरसाने वाले भगवान गणेश, हमारे बाप्पा आज वापिस चले जायेंगे । उनकी विदाई भी आगमन की तरह ही शानदार होनी चाहिये । इस अवसर पर मेरे स्वर्गीय बडे भाई साहब द्वारा रचित हिंदी में गणेश आरती ( जो मराठी आरती का  अनुवाद है और  तर्ज भी वही है ।) प्रस्तुत है । वे ऋतुरंग नाम से लिखते थे ।
           ।। श्री ।।
सुख कर्ता दुखःहर्ता वार्ता संकट की
तनिक न रहने पाये महिमा है उनकी
सिंदूरी उबटन से लिपटी छबि तनु की
कंठ दमकती माला श्री मुक्ताफल की
जय देव जय देव जय मंगल मूर्ती
हे श्री मंगल मूर्ती
दर्शन से ही मन की
चिंतन से ही मन की
कामना पूर्ती  ।। जय देव जय देव
रत्नजटित सिंहासन गौरी नंदन का
लेप लगायें कुकुम केसर चंदन का
हीरों जडा मुकुट है मस्तक पर बांका
रुनझुन रव नूपुर है, चरनों में हलका ।। जय देव जय देव
लंबोदर पीतांबर बांधा फणिवर से
सूंड सरल, वक्रानन, नयन त्रय मणि से
दास राम का जोहे बाट चिरंतन से
संकट दूर भगायें
ऋतु रंगीन बनाये
प्रभु करुणा घन से ।। जय देव जय देव
शरद काळे (ग्वालियर )
गणपति बाप्पा मोरया ! अगले बरस तू जल्दी आ ।





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