शनिवार, 9 फ़रवरी 2008

कैसा आया है वसंत

कैसा ये आया है वसंत
सर्दी में ठिठुरा ठिठुरा सा
धुंद की गीली चादर ओढे
कोई बूढा झुका हुआ सा

कहाँ खो गई धूप गुनगुनी
कहाँ छुप गई हवा बसंती
सिकुड गई नन्ही सी कलियाँ
बिन सूरज़ के कैसे खिलती

पंछी हुए बावले फिरते
तितली की हिम्मत ना होती
कैसे ढूंढे बाग बगीचे
ना कोई संगी ना कोई साथी

कोयल भी है चुप्पी साधे
भौरों नें छोडा गुंजारव
सर्दी ने सबको जकडा है
आसमंत सब नीरव नीरव

कैसा ये आया वसंत
जब गुम हो गये रंग सजीले
शाल दुशाले चादर ओढे
दुबक गये वासंती चोले
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