गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

दिन नीके नीके



रस, रंग, सुगंध, उमंग भरे
दिन नीके नीके औ निखरे।


मन में प्रिय सुधि जागे ऐसे
कोहरे से धूप छने जैसे
मन आकुल व्याकुल मीलन को
जगे रोम रोम में पुलक कैसे
फूलों पे मंडराते भंवरे
दिन नीके नीके औ निखरे।

खेतों में सोने सी सरसों
उनको आ जाना है परसों
कल का दिन बीतेगा कैसे
पिय की छवि देखत हूँ हर सों
बादल से धवल सुंदर संवरे
दिन नीके नीके औ निखरे।

शिशिर की हुई हलकी सिहरन
कोमल सी धूप खिली आंगन
बजते हवा के घुंगरू छनछन
गोरी के थिरक उठे कंगन
एक लहर उठी शब्दों के परे
दिन नीके नीके औ निखरे।

दुलहन सी धरा सजी सँवरी
मेहेंदी रचे, केसर की क्यारी
दूल्हे ऋतुराज के स्वागत में
छेडती तान कोयल प्यारी
गायक न्यारे, पंछी, भँवरे,
दिन नीके नीके औ निखरे



चित्र गूगल से साभार
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