गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

क्षणिकाएं

क्षणिकाएं

उगता सा कुछ दिल के अंदर
ये मेरी चाह है
या तुम्हारी चाहत ।

आंखों में नींद है ना चैन
किरचें चुभती हैं
आंसुओं की ।

धूप के छोटे छोटे टुकडे
बिस्तर पर फैले,
यादों के साये ।

चाय के साथ कमरे में आती तुम,
चेहरे पे धूप छांव
आती जाती ।


कुछ ना कहो, छलक जायेंगी
यूं ही तैरती सी लगती हैं
ये पनीली आंखें ।

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देह झुलसाती कडकती धूप
याद आता है
पापा का गुस्सा ।


बरसता मेह, भीगती धरती
पानी के परनाले
मां की आंखें ।

पुराने कंबल के भीतर लगी
पुरानी चादर, गर्माहट
माँ के आंचल सी ।


गर्म मौसम में ठंडी हवा
खस में भीगी
दीदी का प्यार


आईस कैंडी सा सुकून देता
ठंडक पहुंचाता
भैया का दुलार


संध्या रंग गालों पर बिखराती
मन को गुदगुदाती
पिया मनुहार
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