मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

आदमी खोया कहां है ?

इक आदमी को ढूंढते हैं
ये आदमी खोया कहां है

ढूंढा उसे हर रास्ते पर
हर गांव में और हर नगर
दौड दौड ठहर ठहर
आया कहीं न नज़र मगर
सोचते ही रहे हम फिर
आदमी खोया कहां है ।

ढूंढा उसे फिर झोपडों में
चिरकुटों में चीथडों में
फ्लेटों में अट्टालिका में
बंगलों मे, बाडियों में
था ही नही, मिलता कहां
वो आदमी खोया कहां है ।

हाटों में और बाज़ारों में
मॉलों में और होटलों में
ढाबों में और रेस्तरॉं में
गिलासों में बोतलों में
मिला नही फिर मिलता कैसे
वो आदमी खोया जहां है ।

मुफलिसों में, अमीरों मे,
जाहिलों, विद्वज्जनों मे
दुर्जनों में, सज्जनों मे
देश के सारे जनों में
ढूंढते फिरते रहे पर
आदमी पाया कहां है ।

सुनामी में, तूफानों में,
बाढ में भी अकालों में
जिंदगी में और कालों में
उत्सवों मे, हादसों में,
काम कर के थक गया जो
नाम से कतरा गया जो
वो आदमी सोया यहां है
आदमी खोया कहां है ।



एक टिप्पणी भेजें