शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

पोर्टलैन्ड हार्बर ओर आयलैन्डस् क्रूझ।


 अभी हाल ही हम घूम कर आये अमित (हमारा छोटा बेटा) के यहां से । अमित, डरहम, न्यू हैम्पशायर में रहता है । वहां से मेन राज्य आधे घंटे के ड्राइविंग अंतर पर है। कैनडा से लगे इस मेन राज्य का एक महत्व पूर्ण शहर है पोर्टलैन्ड। यह एक बंदरगाह भी है। यहां से कई छोटी बडी नौका और जहाजी सैर (क्रूझेज) आयोजित की जाती हैं।  एक शनिवार को अमित ने एक क्रूझ का कार्यक्रम बनाया । यह कोई पौने दो घंटे की सैर थी कॉसेको-बे की। कॉस्को बे में छोटे बडे मिलाकर कोई चौरासी द्वीप हैं । इनमें से बहुत से तो केवल जंगल ही है पर कई बसे हुए हैं। इन में कईयों पर लाइटहाउस बने हुए हैं। इस क्रूझ में हम छह द्वीपों की सैर करने वाले थे। जैसे कि सब जानते हैं अंग्रेज यहां आकर बसे और उन्होने अपने माल की यानि जहाजों की सुगम आवा-जाही के लिये लाइट हाउस बनाये। मेन राज्य अमेरिका का अंतिम उत्तर-पूर्वी राज्य है। कनाडा और इसके बीच केवल समुद्र ही है।
 कॉस्को बे, गल्फ ऑफ मेन का एक इनलेट है जो मेन राज्य के दक्षिणी किनारे पर है। इसका पुराना नाम ऑकोसिस्को था जो एक एबेनाकी नाम है (यहां के मूल निवासी)।  पुर्तगाली एक्सप्लोरर गोभा ने इसे कॉस्को-बे  नाम दिया।
हमारी एक 70-75 सीटों वाली मेकेनाइज्ड बोट थी इस पर एक डेक भी बना था। यहां से नज़ारा ज्यादा अच्छे से देखा जा सकता था। पानी से मुझे वैसे ही बहुत प्रेम है। पानी से, चाहे वह समंदर हो नदी हो या जलाशय, जगह की सुंदरता में चार चांद लग जाते हैं। बशर्ते की साफ स्वच्छ पानी हो।

 हमारी क्रूझ साढे चार बजे शुरु होने वाली थी। अमित ने बुकिंग फोन पर ही कर ली थी। अमित, अर्चना (हमारी बहू), उनके दोनो प्यारे से बच्चे यश और श्रेया और मै तथा सुरेश, हम छह लोग थे। हम घर से साढे तीन बजे निकले और सवा चार बजे पोर्टलैन्ड हार्बर पहुंच गये। वादा था कि हम बहुत पांच छह द्वीप लाइट हाउस तथा सील्स देख पायेंगे। हम बोट पर गये तो अमित सुरेश और यश डेक पर चले गये। हवा बहुत तेज थी तो मै अर्चना और श्रेया अंदर आ कर बैठ गये।




 ठीक चार चालीस पर हमारी बोट चल पडी। शुरु शुरु में तो पोर्टलैन्ड शहर ही दिख रहा था।
पीक द्वीप
थोडी देर बाद दिखा पीक द्वीप। यह पोर्टलैन्ड से कोई 3 मील दूर है करीब करीब इसी का हिस्सा। यह सबसे बडी बस्ती वाला द्वीप है। पहले इसे कोनी द्वीप के नाम से जाना जाता था। यहां रेस्तराँ, म्यूजियम, कॉटेजेस थियेटर सब है  कायाकिंग और गोल्फ खलने की भी सुविधा है। पर हम तो इसे दूर से ही देखने वाले थे। थोडी देर बाद मैने भी सोचा कि डेक पर हो आती हूँ। पानी और हवा को नजदीक से जानती हूँ, पर वहाँ तो हवा ऐसी तेज थी कि मुझे लगा कि बचे खुचे बाल भी हवा में उड जायेंगे। तो लौट के बुध्दू वापिस अंदर।
पानी में हमारी बोट के अलावा और भी बहुतसी तरह तरह की नौकायें थीं बहुत से पक्षी भी खाने पीने की तलाश में उड रहे थे और पानी में गोते लगाने की कोशिश में थे। हमने आगे देखा एक पथरीला द्वीप, इसके एक छोर पर बिलकुल आदमी के चेहरे की आकृति बनी थी।





रैम लैज द्वीप-

आगे हमने देखा सबसे पुराना लाइट हाउस रैम लेज द्वीप पर।

 यह पोर्टलैन्ड हारबर के मुहाने पर ही है। यह रैम आयलैन्ड से 100 मीटर अंदर है। रैम आयलैन्ड लेज यह इस द्वीप से निकली कोई एक चौथाई मील लंबी पट्टी है जो आरी की तरह किनारे वाली है। यह नाविकों के लिये काफी खतरनाक और डरावनी जगह मानी जाती रही है। केलिफोर्निया के एक जहाज की 1900 में  यहां दुर्घटना होने के बाद 1902 में यह लाइट हाउस बनाया गया। अब क्यूं कि यहां बहुत से लाइट हाउस हो गये हैं उसकी उपयोगिता उतनी नही रही । अब यह व्यक्तिगत मालिक की संपत्ती है जिसने इसे सिर्फ मैन स्टेट में रखने के लिये खरीदा । यह बंद है पर शायद लाइट अभी भी जलती है।

पोर्टलैन्ड हेड लाइट - यह कैप एलिझाबेथ द्वीप पर बना एक ऐतिहासिक लाइटहाउस है। इसे प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन की पहल पर 1787 से 1791 तक बनाया गया। यह पोर्टलैन्ड हार्बर के मुहाने पर ही स्थित है। यह सबसे पुराना लाइट हाउस है। पहले इसमें लाइट व्हेल की चरबी से जलाई जाती थी पर अब यह पूरी तरह से बिजली से चलता है।
अमेरिकन सिविल वॉर के दौरान इसकी ऊँचाई 20 फीट बढाई गई ताकि दूर से लाइट नजर आये। पर बाद में कम कर दी गई। यह अब कोस्ट गार्ड की देख रेख में है।



   
बग लाइट पार्क - यहां से पोर्टलैन्ड शहर का सुंदर दृष्य दिखता है पर हम तो यह अपने बोट से ही देख रहे थे। यह द्वितीय विश्वयुध्द के दौरान जहाज बनाने का एक बडा ही महत्व पूर्ण अड्डा था। यहाँ 1941 से 1945 के दौरान कोई 30,000 लोग काम में लगे हुए थे। ये लोग न्यू इंग्लैंड शिप बिल्डिंग कारपोरेशन और साउथ पोर्टलैन्ड शिप बिल्डिंग कारपोरेशन के लिये जहाज बना रहे थे। आज कल यह बोटिंग तोथा पिकनिक के लिये एक उत्तम स्थान माना जाता है।
बग लाइट या पोर्ट लैन्ड बैक वॉटर लाइट हाउस जब 1855 में बनाया गया तब बहुत ही छोटासा लकडी का लाइट हाउस था इसकी छोटी आकृति की वजह से इसे बग लाइट कहने लगे। बाद में 1875 में इसकी जगह एक नया सुंदर ग्रीक आर्किटेक्चर पर आधारित
लाइट हाउस बना।  इसकी देखभाल की जिम्मैदारी सिटी ऑफ साउथ पोर्टलैन्ड पर है।


स्प्रिंग पॉइन्ट लाइट हाउस- यह लाइटहाउस 1897 में तब बनाया गया जब बहुतसे शिप कंपनियों ने  जहाजों की स्प्रिंग पॉइंट-लेज से टकराने की शिकायत की। इसमें एक फॉग बेल भी लगाई गई जो हर 12 मिनिट पर बजती थी।


समय समय पर इसमें कई सुधार किये जाते रहें। इसे 1934 में बिजली से चलाया जाने लगा और इसको  मुख्य जमीन से जोडने के लिये 900 फुट लंबा ग्रेनाइट का ब्रेक वॉटर बनाया गया । पहले इसकी देखभाल का जिम्मा कोस्ट गार्डस का था पर अब यह स्प्रिंगपॉइन्ट लेज लाइट ट्रस्ट के जिम्मे है।

हमने एक ऐसा द्वीप भी देखा जहां केवल चार परिवार रहते हैं और वे किसी और को यहाँ जमीन खरीदने भी नही देते।
 बोट पर खाने पीने की चीजें भी बिक रहीं थी जैसे कि अमूमन होता है और बच्चे साथ हों तो इस को अनदेखा बिलकुल नही कर सकते। श्रेया और य़श नें भी हंग्री हंग्री की रट लगा रखी थी। तो खाने पीने का सामान खरीदा गया, हमने भी थोडा चबैना चख लिया।

बहुत से द्वीप केवल जंगल हैं जहां पर कोई बस्ती नही है।

टू लाइट टॉवर- यह सन 1828 में कैप एलिझाबेथ में बनाया गया। शुरु में इसके दो  पथ्थर से बनाये गये टॉवर्स थे। मेन राज्य में इस तरह का यह पहला लाइट हाउस था। इसके दो लाइट्स कॉस्को बे के मुहाने से पोर्टलैन्ड हारबर तक का रास्ता उजागर करते थे। यह बाद में यह कास्ट आयरन से बनाया गया और इसमें फ्रेझनेल लेन्स भी लगाये गये। 1924 में  खर्च कम करने के लिये सारे ट्विन लाइटस् को एक ही लाइट में बदल दिये।अब इसका एक ही टॉवर दिखता है और इसकी रोशनी काफी तेज है।
                                                           

ये सारे लाइट हाउस और द्वीप देखते देखते समय बहुत बढिया गुजर रहा था। कहीं उतरना तो था नही बस बोट में बैठ कर कमेंट्री सुननी थी। अब हमें देखना था फोर्ट गॉर्जेस। दूर से देखने पर यह किसी जेल सा दिखता है। इसका निर्माण   1008 में ही शुरु हो गया था पर  पैसे के अभाव में रुक गया, 1857 में काम फिर शुरु हुआ पर सिविल वॉर के दौरान काम में तेजी आई और यह 1865 में बनकर तैयार हो गया। द्वितीय महायुध्द के दौरान सबमरीन माइन्स को रखने की भूमिका निभाई थी। इसका नाम ब्रिटिश कर्नल फरडिनान्ड गॉरजेस के नाम पर रखा गया था।
फोर्ट गॉरजेस

अब हम देखने वाले थे इस सफर की सबसे दिलचस्प चीज। सील । हमारी बोट काफी आगे जाकर एक टीलेनुमा द्वीप के पास रुकी। वहां काफी सारी सील्स जिनको सी लॉयन  का  कझिन भी कहा जाता है धूप सेंक रही थीं। हमने विडियो लिया आप भी देखें। वहीं पर कोमरॉन नाम के बहुत सारे पक्षी भी थे। इस जगह बच्चों ने भी बहुत मजा लिया। सी लॉयन और इनमें दो प्रमुख अंतर ये हैं  कि इनके कान नही दिखते जब कि सी लॉयन के दिखते हैं और इनके फिनस् छोटे होते हैं । ये जमीन पर लोटते हैं और रेंगते हैं। सी-लॉयन जिनके फिन्स बडे होते हैं इन फिन्स पर चलते हैं।



सील्स को देखने के बाद वापसी के लिये बोट मुडी और पानी और द्वीपों का नजारा दुबारा से देखते हुए हम वापिस पोर्टलैन्ड हार्बर पर आ गये। 

इस छोटीसी नौका सैर का हमने खूब आनंद उठाया। आपको कैसा लगा?




चित्र गूगल से साभार।







एक टिप्पणी भेजें