शनिवार, 1 मई 2010

ईश्वर की अपनी भूमी केरल



हाल ही में यानि कोई दो महीने पहले हम केरल घूमने गये थे, मै, सुरेश और मेरी दोनो भाभियाँ, शरदिनि और अर्चना, जो मेरी ही हम उम्र हैं । यानि सब के सब सीनियर सिटिझन ओर सब के सब वेल्ले (ये दिल्ली वालों का शब्द है फुरसतियों के लिये) ।
तय किया कि पैकेज़ टूर लेंगे जिसमे एयर फेयर भी शामिल हो । ट्रेन से नही जायेंगे क्यूं कि दिल्ली से कोची पहुंचते पहुंचते ही हालत बुरी हो जायेगी । तो हमने पैकेज टूर लिया Make my trip वालों का ।
टूर ७ दिन और ६ रातों का था (१६ फरवरी से लेकर २२ फरवरी तक ) । हवाई जहाज का टिकट और केरल के ४-५ महत्वपूर्ण स्थल दिखाने के लिये टैक्सी भी उसमें शामिल थी जो हमें कोची हवाई अड्डे से लेती और वहीं वापस छोडती । पैकेज़ की कीमत थी २२,००० रु. प्रति व्यक्ती ।
तो १६ तारीख को ८ बजे हम पहुँचे दिल्ली के हवाई अड्डे । चमचमाता हवाई अड्डा देख कर तबियत खुश हो गई । साढे नौ बजे की उडान थी ऑन टाइम । अर्नाकुलम यानि कोची पहुँचे १ बजे । (वि़डियो)
टैक्सी का फोन नं.हमारे पास था ही, फोन किया तो पता चला बाहर ही हमारा इन्तजार हो रहा है ।
बाहर आकर फटाफट टैक्सी में बैठे और चल पडे हमारे पहले पडाव की और, जो था मुन्नार, केरल का हिल स्टेशन । बीच में एक जगह रुक कर पूरी आलू का लंच कर लिया । कोची से मुन्नार कोई ५ घंटे का सफर है कार से ।
शुरु में थोडी गर्मी महसूस हुई दिल्ली से जो चले थे और क्या गज़ब की ठंड पडी थी इस बार दिल्ली में । थोडी देर में मौसम सुहाना हो गया । खूबसूरत हरे भरे जंगल देखते हुए हम चले जा रहे थे । इसीसे शायद इसे God’s own Land कहते हैं । एक जगह खूबसूरत जल प्रपात देखा तो वहीं रुके और तस्वीरें खींची। नारियल पानी भी पिया जो यहां का तो अच्छा नही था यानि कि गरम था । पर बाद में जितने दिन केरल में रहे बराबर नारियल पानी पीने का सिलसिला चलाते रहे वह भी मलाई वाला नारियल क्यूं कि वह तो शर्तिया मीठा निकलता है और प्यास के साथ भूख भी मिट जाती है ।
मन्नार पहुंचे तो होटल देख कर मन प्रसन्न हो गया साफ सुथरे सुंदर कमरे । एक छोटी सी बालकनी वालकनी से दिखते पहाड़ और चाय के गहरे हरे रंग के बागान । होटल का परिसर एक खूबसूरत बगीचा था । जहां नारियल कटहल पाम आदि पेड थे और तरह तरह के फूलों वाले पौधे । हमे पहुंचते पहुंचते साढे पांच बज गये थे तो घूमने का प्रोग्राम तो अगले दिन ही हो सकता था । तो हम हाथ मुंह धो कर नीचे उतरे और बागीचे की सैर कर ली वहां एक छोटे से तालाब में दो बत्तख थे वे लोगों को देखते ही चिल्लाचिल्ला कर खाना मांगते थे (वि़डियो) । ऊपर आये थोडे टी वी के रिमोट से खेला और फिर डिनर के लिये पहुंचे । खाना बहुत स्वादिष्ट था और तेल भी ठीक ठीक इस्तेमाल किया था न ज्यादा न कम ।
अगले दिन ९ बजे तैयार होकर निकल ना था तो थोडी देर गपशप लगाई और सो गये ।
हमारी टैक्सी क्यूं कि मन्नार की ही थी तो वह ठीक ९ बजे हमे लेने आ गई । उसके पहले हमने बडा सा नाश्ता कर लिया इडली सांबार चटनी , टोस्ट, जाम और बटर, फल, जूस और कॉफी ।
पहले गये मुन्नार के फूलबाग (Flower Garden ) .इतने सारे और इतने तरह के फूल थे कि नाम याद रखना मुश्किल लग रहा था । आप तो बस ये विडियो क्लिप देखें और शेक्सपीअर जी को याद करें जो कह के गये हैं कि नाम में क्या रख्खा है गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो रहेगा तो वो गुलाब ही । पर नही शायद विडियो आपकी मदद करे, क्यूंकि नाम तो हैं फूलों के और हमें जानना भी चाहिये ।(वि़डियो)
 बीच में एक जगह हाथी की सवारी के लिये जगह थी । कोई ४- ५ हाथी थे जो लोगों को सवारी करा रहे थे । हमने सवारी तो नही की पर फोटो जरूर खींचे । लोग हाथी पर एक सब्जी और फलों से भरी टोकरी लेकर चढते और हाथी सूंड ऊपर कर उनसे वह टोकरी ले लेता खाकर फिर वापस कर देता, आप भी देखिये । मेरी पोती के लिये टी वी से नोट की हुई एक कविता याद आ गई ।
हौदा हल्लम हल्लम और हाथी चल्लम चल्लम,  
हम बैठे हाथी पर और हाथी टल्लम टल्लम
बगीचे की सैर कर के  और हाथी देख कर, हम गये ईको पॉइंट यहां एक खूबसूरत झील है जहां खडे होकर जोर से चिल्लाओ तो आवाज लौट कर आती है । पहाड जो है सामने , हाँ आवाज में दम होना चाहिये । यहीं बहुत से नारियलपानी वाले भी थे, तो पिया नारियल, बडा ही मीठा । यहीं पर कुछ ठेले वाले थे जो छोटी छोटी प्लास्टिक की बोतलों में तेल बेच रहे थे । नीलगिरी (यूकेलिप्टस) का तेल, लेमनग्रास ऑयल, लौंग का तेल वगैरा । कुछ दुकानों में बच्चों के लिये बैटरी से चलने वाले खिलौने भी थे । इनमें एक लाल रंग की चिडिया थी जो पेड की डंडी पर बैठी थी ताली बजाओ तो पंख फडफडाती और कूकती । हमने एक एक खरीद ली । कुछ इमिटेशन ज्वेलरी की दुकानें भी थीं सब मेड इन चायना पर थीं बडी खूबसूरत । हमारे ही देश में हमे ही मात दे रहे हैं चीनी । (वि़डियो)


सैर तो हो गई तो अब पेट पूजा, तो एक रेस्तरां ढूंढा और खाना खाया । खाना कुछ खास नही था तो तय किया कि अब से होटल में ही खायेंगे बाहर नही ।
खाना खाकर फिर एक और पार्क में गये वहां भी टिकिट था पर पार्क सुंदर था हालांकि रख रखाव और अच्छा हो सकता था । लेकिन यहां टिकिट ही पिक्चर पोस्ट कार्ड थे  बडे ही सुंदर, जिन्हें हम बाद में प्रयोग कर सकते हैं । वहीं से फिर एक जगह चाय बागान भी देखे ।
फिर लौटे होटल इग्लू । पूरे घूमने में कहीं भी रास्ते पर प्लास्टिक की थैलियां फिकी नही दिखी, रास्ते भी साफ सुथरे थे । बडा अचछा लगा पर यह सिर्फ मुन्नार तक ही सीमित था ये बाद में पता चला । (क्रमशः)

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